वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत कब मनाते हैं

हिंदू पंचांग के अनुसार अखण्ड सौभाग्यवती, पति और पुत्र के दीर्घायु के लिए वट सावित्री ज्येष्ठ माह (मई-जून) के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है।

वट सावित्री व्रत क्यों मनाते हैं

पुराणों के अनुसार मां सावित्री देवी की कृपा से विशिष्ट परिस्थितियों में इनका जन्म होने के कारण ही सावित्री नाम रखा गया था।

विवाह योग्य होने पर साल्व देश राजा द्युमत्सेन के अल्पायु पुत्र सत्यवान से विवाह रचाया। पति की मृत्यु को टालने और अपने सुहाग की रक्षा के लिए सावित्री ने कठोर व्रत तपस्या करनी शुरू कर दी। इसका आशीर्वाद उन्हें बाद में मिला था।

सत्यवान के अंतिम समय का अहसास होने पर सावित्री ने सत्यवान के साथ वट वृक्ष के नीचे तप, पूजा-अर्चना करनी शुरू कर दी।

कहा जाता है कि काल के समय को और कर्म के प्रभाव को न टालते हुए यमराज महाराज ने सत्यवान के प्राण ले लिए, परन्तु सावित्री ने यमराज का पीछा किया और अपने दृढ़ निश्चय, तप, साधना,व प्रेम से यमराज को प्रभावित करके तीन वरदान प्राप्त किए।

पहले वरदान में अपने ससुराल वालों के राज्य को वापस मांगा, दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए एक पुत्र, और तीसरे व अंतिम वरदान में अपने लिए संतान की प्राप्ति। यमराज ने तीनों वरदान स्वीकार किए और सत्यवान को जीवनदान दे दिया।

सत्यवान को जीवन दान मिलने पर सावित्री वट वृक्ष के पास वापस लौट आई तब तक सत्यवान जीवित हो गये थे। पतिव्रता सावित्री के तपोबल, दृढ़ निश्चय, सदा सुहागन बनी रहने की शक्ति के कारण महिलाएं वट वृक्ष की पूजा और वट सावित्री व्रत करती हैं।

सावित्री माता के आशिर्वाद स्वरूप उनके पति की आयु लंबी हो और उनका वैवाहिक जीवन सुखी बना रहे।


वट वृक्ष की पूजा क्यों होती है?

बरगद का वृक्ष एक बहुवर्षीय विशाल वृक्ष होता है हिन्दू परंपरा में इसे पूज्य माना जाता है। प्राचीन काल में अलग अलग देवों से अलग अलग वृक्ष उत्पन्न हुए, उस समय यक्षों के राजा मणिभद्र से वटवृक्ष उत्पन्न हुआ जो त्रिमूर्ति का प्रतीक होता है इसकी छाल में विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव जी का वास और प्रकृति के सृजन का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए वट सावित्री व्रत के समय महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करतीं हैं और वृक्ष की सात परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत (मौली धागा) भी बांधती हैं।

भारत का राष्ट्रीय वृक्ष होने के साथ यह धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस वृक्ष के पत्ते, फल और छाल शारीरिक बिमारियों को दूर करने के काम आते हैं।


वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री—

वट सावित्री व्रत के लिए पूजन सामग्री एक दिन पहले ही एकत्र कर ली जाती है।

सत्यवान-देवी सावित्री की मूर्ति-चित्र

रक्षा सूत्र-कच्चा सूत

बांस का बना पंखा

रोली, कुमकुम, सिंदूर, चंदन, अक्षत्

फल, फूल, बरगद का फल

धूप, दीपक, इत्र, गंध,

सुहाग की सामग्री, सवा मीटर कपड़ा पान, सुपारी, नारियल

वट सावित्री व्रत कथा और पूजा विधि की पुस्तक

जल से भरा कलश

मिठाई, बताशा, मखाना, घर पर बना पकवान, भीगा चना, मूंगफली, पूड़ी, गुड़ आदि।


वट सावित्री व्रत कैसे मनाते हैं

वट सावित्री व्रत के दिन प्रातः काल घर की साफ-सफाई और नित्य कर्म से निवृत्त होकर गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं। भारतीय वस्त्र धारण कर पैरों में महावर लगायें, बरगद के पत्तों से श्रृंगार करें, सुहाग की चुनरी ओढ़े।

वट सावित्री में वट (बरगद) और सावित्री देवी की पूजा का विधान है, अतः वट वृक्ष के नीचे साफ सफाई, जल छिड़कने के पश्चात भूमि पर स्वास्तिक बनाएं और उसके ऊपर कलश की स्थापना उसमें लौंग, इलायची, सिक्का, सुपारी, हल्दी गांठ अक्षत, दूर्वा आदि डालकर पंच पल्लव लगाकर कर लें उसके ऊपर दीपक जला दें। वट वृक्ष के पत्ते के ऊपर सुपारी से गणेश जी की और गोबर से गौरी माता की स्थापना करें, जल से स्नान कराएं, जनेऊ, कलावा, अर्पित करते हैं।

बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्माजी, सत्यवान, सावित्री और यमराज की प्रतिमा को स्थापित करते हैं, रोली- कुमकुम-सिंदूर-चंदन से तिलक लगायें, जनेऊ, अक्षत अर्पित करें।

वट वृक्ष की जड़ में गंगाजल मिले जल को

‘’अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।

पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते’’।।

मंत्र पढ़ते हुए अर्पित करते हैं।

फल, फूल, धूप, मौली, रोली, श्रंगार की सामग्री, भिगोया चना, मिठाई, बांस का पंखा अर्पित करें।

पूजन सम्पन्न होने से पूर्व सभी की आरती की जाती है।

वट सावित्री व्रत में सात बार या ग्यारह बार वट वृक्ष के चारों तरफ कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करनी चाहिए।

वट सावित्री व्रत के दिन पूजा के समय हाथ में भीगा चना लेकर, सत्यवान सावित्री की कथा सुननी चाहिए। वट वृक्ष को चुनरी के एक कोने से सिंदूर लगाते हैं और उसके बाद पाच बार या सात बार सिन्दूर लिया भी जाता है।

कथा के बाद भीगा चना, वस्त्र, दक्षिणा आदि सास को देने के बाद पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

वट और सावित्री की पूजा के बाद पान, सिंदूर और कुमकुम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है।

महिलाएं अमावस्या को एक दिन का ही व्रत भी रखती हैं।


कथा पूजन उपरांत

मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं

सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये।

मंत्र का जाप करते हुए वट वृक्ष की कोपल या फल खाकर उपवास खोल लेते हैं या पारण करते हैं।


वट सावित्री व्रत के दिन मंदिर या सार्वजनिक स्थल पर बरगद का एक पौधा जरूर लगाएं, इससे पारिवारिक और आर्थिक समस्या से मुक्ति मिलती है सौभाग्यवती महिला को सुहाग की सामग्री का दान करें।


वट सावित्री व्रत में क्या नहीं करना चाहिए

महिलाएं वट वृक्ष (बरगद) के वृक्ष की पूजा न करके एक छोटे से गमले में लगे बरगद या उसकी टहनी को गमले में लगाकर पूजा कर लेती हैं जो पूर्ण नहीं होती है।

शास्त्रों के अनुसार ये उचित नहीं माना जाता है, क्योंकि बरगद की छाल में विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है और वृक्ष की नीचे की ओर लटकी शाखाओं को मां सावित्री कहा जाता है।

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वट सावित्री व्रत